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अभिप्रेरणा की परिभाषाएं|| प्रेरणा की परिभाषा हिंदी में || प्रेरणा और अभिप्रेरणा में अंतर





अभिप्रेरणा और अधिगम

अभिप्रेरणा से तात्पर्य एक ऐसी संकलपना से है। जो किसी व्यक्ति को कोई कार्य करने के लिए प्रेरित करती है। अभिप्रेरणा कोई वाह्य शक्ति या तत्व नहीं होता है।जिसे आसानी से छात्रो में डाला जा सके।अभिप्रेरणा एक ऐसी आंतरिक शक्ति होती है ।जो व्यक्ति को उद्देशित  करने के लिए प्रोत्साहित करती है।

अर्थात अभिप्रेरणा एक ऐसी आंतरिक शक्ति होती है।जिसके द्वारा हम किसी भी व्यक्ति में किसी भी तरह के,विचारों के लिए उसे प्रोत्साहित कर सकते हैं।और किसी भी कार्य को करने के लिए प्रेरित भी कर सकते हैं।


अभि प्रेरणा उत्पन्न करने के लिए ,कारक :- 


  1.पुरस्कार:- जब भी हम किसी बालक को किसी भी कार्य को पूर्ण करने के लिए पुरस्कृत करते हैं तो बालक को कुछ उपहार अवश्य भेंट करें जिससे कि उसे आगे दूसरे कार्य करने के लिए प्रेरणा मिल सके और वह मोटिवेट हो सके। पुरस्कार देने से बच्चे के अंदर  आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे बच्चा किसी भी कार्य को अच्छे ढंग से करता है।
 और आने वाले समय में उसी कार्य को पहले की भांति और बेहतर तरीके से करता है ।
इसलिए पाठ्यक्रम के साथ-साथ ,कुछ खेल प्रतियोगिताओं का भी आयोजन करना चाहिये,ओर बच्चों को पुरस्कृत करते रहना चाहिए

  2:-आकांक्षाएं 
  3- दंड 
  4.सामाजिक प्रतिमान
  5. भय 
  6.आदर्श लोगों की कहानियां 
  7. अभाव का  होना 
  8. प्रेरणा देना/प्रेरित करना।

अभिप्रेरणा का अधिगम से सम्बन्ध/प्रेरणा और अभिप्रेरणा में अंतर


 1.अभिप्रेरणा के बिना अधिगम कमजोर पड़ जाता है। अर्थात अभिप्रेरणा के साथ-साथ अधिगम का सम्बन्ध भी बहुत ज्यादा आवश्यक होता है। 
अधिगम और प्रेरणा आपस में मिलकर एक संबंध स्थापित करते हैं जो संबंध बालक के अंदर साफ साफ झलकता देखा जा सकता है।
2. अभिप्रेरणा के बिना ,बच्चा आलसी भी हो जाता है।क्योंकि उसे अपने जीवन में आगे क्या करना है,कैसे करना है । आदि की सटीक जानकारी नहीं होती है। इससे वह किसी दूसरे कार्य को करने में अलसीपन कर देता है। इसलिए किसी भी कार्य में निरंतरता लाने के लिए एक अभिप्रेरणा की आवश्यकता होती है।

3. अभिप्रेरणा के द्वारा बालक किसी भी संप्रत्य को सीखने के लिए हमेशा तत्पर होता है। इसलिए बालक के अंदर अभिप्रेरणा देने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिये। जिससे बालक किसी भी परिस्थिति में किसी भी संप्रत्य को अच्छे से सीख सकें।

4. अभिप्रेरणा ,व्यक्ति के द्वारा ही, हम किसी कार्य को सफलता पूर्वक कर सकते है। अभिप्रेरणा ही किसी कार्य को करने के लिए बाध्य करती है। अभिप्रेरणा के द्वारा ही हम किसी भी कार्य को सफलतापूर्वक कर सकते हैं।

5.अभिप्रेरणा से किसी भी कार्य को करने की रुचि उत्पन्न होती है। अर्थात अभिप्रेरणा और रुचि में भी एक संबंध होता है। अभिप्रेरणा के बगैर रुचि उत्पन्न नहीं की जा सकती है।

 दोस्तों अभी हमने आपको इस पोस्ट में अभिप्रेरणा और अधिगम के विषय में अवगत कराया है। अभी हमने सिर्फ आपको अभिप्रेरणा और उसके बारे में संपूर्ण जानकारी दी है। अभिप्रेरणा से उत्पन्न होने वाले कारकों के विषय में भी आपको अवगत कराया है।

अधिगम को प्रभावित करने वाले कारक

 बुद्धि:- शिक्षार्थी को बुद्धि का प्रभाव अधिगम पर प्रत्यक्ष पड़ता है। कम बुद्धि वाले छात्र किसी पाठ के देर से सीखते हैं ।और जल्दी ही भूल जाते हैं।
 तथा तेज बुद्धि वाले छात्र पाठ को आसानी से सीख लेते हैं,और जल्दी नहीं भूलते। 
इसीलिए कम बुद्धि वाले छात्रों को पड़ी हुई, पाठ्यवस्तु को याद करने के लिए पाठ्यवस्तु का बार-बार स्मरण करना चाहिए। जिससे कि वह पाठ्यवस्तु को आसानी से याद कर सकें

2.स्वास्थ्य,उम्र:- स्वस्थ बच्चे , अस्वस्थ बच्चों की तुलना में जल्दी सीखते हैं ।शेषअवस्था में सीखने की गति तीव्र होती है,ओर  बाल अवस्था में मंद होती है। तथा किशोरावस्था में पुनः तीव्र हो जाती है। इसलिए बच्चे की अधिगम क्षमता पर उसकी उम्र और स्वास्थ्य का भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। उम्र के हिसाब से भी बच्चे के अंदर अधिगम क्षमता विकसित होती है।

3.अवधान और  क्षमता :- अधिगम को प्रभावित करने मे अवधान और क्षमता का भी अहम रोल होता है। इसमें रुचि और क्षमता भी सम्मिलित होती है दरअसल जब बच्चा अपने मनपसंद की पाठ्यवस्तु को पड़ता है तो उसे अधिगम करने में अधिक रूचि होती है जिससे वह अच्छी तरह से उस विषय को  अच्छे व रुचि लेकर पढ़ेगा।

4.परिपक्वन(Maturation)

5.अभिप्रेरणात्मक एवं संवेगात्मक स्थिति 

6.सीखे जाने वाले विषय का स्वरूप:- बच्चों के अधिगम की क्षमता को विकसित करने में सीखे जाने वाले विषय भी बहुत ही आवश्यक होते हैं ।
दरअसल बच्चा  क्या पढ़ रहा है, कैसे पड़ रहा है।
यह जानना भी अति आवश्यक होता है। जिससे कि उसकी अधिगम क्षमता पर किसी प्रकार का कोई प्रभाव ना पड़े अर्थात ऐसे बच्चों को उचित ढंग से शिक्षाएं दी जाती है। जिससे कि बालकों के लिए उचित शिक्षा की व्यवस्था हो सके।
7.अवसर:- बालक को पाठ्यवस्तु के बार-बार अवसर प्रदान करने चाहिए। जिससे कि बालक के अधिगम में विकास हो सके। 
बार- बार पाठ करने से बच्चे की अधिगम क्षमता विकसित होती है। जिससे कि वह पाठ्य -वस्तुओं को अधिक दिनों तक याद कर सकता है। और उसका प्रयोग अपने दैनिक-जीवन में कर सकता है। इसलिए बच्चों को पुनः स्मरण करने की आदत डालनी चाहिए।जिससे कि वह अपनी शिक्षा में प्रगति कर सकें।

8.वातावरण:- बालक की अधिगम स्तर पर भाषा और बता भी बहुत अधिक प्रभाव पड़ता है। यहां वातावरण से मतलब ,ऐसे माहौल से होता है। जहां पर बच्चा अधिगम    कर रहा होता है।
अगर बच्चे को अधिगम के समय में अच्छा वातावरण प्राप्त नहीं होता है। तो इस चीज का  प्रभाव बच्चे  की अधिगम क्षमता पर पड़ जाता है। जिससे वह पूर्ण रुप से अधिगम को करने के लिए सक्षम नहीं हो पाता है। इसलिए एक बच्चे को अच्छे वातावरण की आवश्यकता पड़ती है। ताकि उस बच्चे के अधिगम में किसी भी प्रकार की कोई रुकावट उत्पन्न ना हो सके।

9.आनुवंशिकता:- बच्चे की अधिगम क्षमता पर अनुवांशिक प्रभाव भी पड़ सकता है। कभी कभी देखा जाता है कि किसी बच्चे के मां बाप बहुत ज्यादा तेज दिमाग  के हैं। ओर उनकी संतानें भी उसी प्रकार तेज दिमाग की होती हैं।
 यह एक प्रकार से, अनुवांशिकता के कारण ही ऐसा संभव हुआ है। दूसरी तरफ देखे तो यदि किसी व्यक्ति के मां- बाप बहुत ज्यादा होशियार हैं। तो इसका मतलब यह नहीं कि उसकी औलाद भी उतनी ही होशियार होगी।

10.सीखने-सीखाने की विधियाँ:- बच्चे की अधिगम क्षमता को विकसित करने के लिए शिक्षक द्वारा इस्तेमाल की गई ,शिक्षण विधियाँ भी, ज्यादा उपयोगी साबित होती है।

11.शिक्षक की योग्यताएं:- शिक्षक की योग्यताएं भी उतनी आवश्यक होती है। जितना कि शिक्षण की विधियां अर्थात बालक के अधिगम के लिए एक उचित शिक्षक की आवश्यकता होती है। इसीलिए विद्यालय मे एक योग्य शिक्षक होना अति आवश्यक होता है।


दोस्तों हमने आपको इस पाठ में बुद्धि को प्रभावित करने वाले कारकों को विस्तारित रूप से बताया है दोस्तों अगर आपको हमारी यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो कृपया इस पोस्ट को अपने दोस्तों मित्रों तक जरूर शेयर कीजिए और हमसे जुड़ने के लिए हमारे पेज को भी फॉलो कीजिए चलिए मिलते हैं दोस्तों अगली पोस्ट में जब तक के लिए धन्यवाद!!

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